मैंने हाल ही में देखा है कि कैसे मुंबई और बेंगलुरु में मानसून के पैटर्न बदल रहे हैं — बारिश उतनी ही होती है, कभी-कभी कम भी, लेकिन शहर डूबने में देर नहीं लगती। इस साल मुंबई और पुणे में लगातार 48 घंटों से ज्यादा समय तक सड़कें जलमग्न रहीं। यह सिर्फ एक मौसमी हादसा नहीं, बल्कि दशकों की शहरी नियोजन संबंधी लापरवाही का नतीजा है, जिसे मैं करीब से देखता आया हूँ।
जब आंकड़े कहानी बयां करते हैं
मुझे यह जानकर हैरानी नहीं होती कि भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) के एक अध्ययन के अनुसार बेंगलुरु में 1973 से 2010 के बीच निर्मित क्षेत्र में करीब 632% की बढ़ोतरी हुई, जबकि इसी दौरान जल-निकायों यानी झीलों और तालाबों में करीब 79% की गिरावट दर्ज की गई। यह आंकड़ा अपने आप में बताता है कि शहर का पानी अब जाए तो जाए कहाँ।
मुंबई का “अभूतपूर्व” मानसून
मुंबई में इस साल की बारिश को कई मौसम विशेषज्ञ “अभूतपूर्व” बता रहे हैं। तूफानी जल निकासी नालों को चौड़ा किया गया, बाढ़ द्वारों को मजबूत किया गया, फिर भी कई इलाकों में जलभराव जारी रहा। विशेषज्ञों का कहना है कि सिर्फ नालों को चौड़ा करना या बाढ़ द्वार मजबूत करना पर्याप्त नहीं, जब तक शहर के प्राकृतिक जल-अवशोषण क्षेत्र — जैसे मैंग्रोव, गीली भूमि और खुले मैदान — सुरक्षित नहीं रखे जाते। इससे साफ है कि सिर्फ इंफ्रास्ट्रक्चर अपग्रेड करना काफी नहीं है।
दिल्ली, गुरुग्राम, हैदराबाद, चेन्नई — एक जैसी कहानी
यह समस्या सिर्फ मुंबई या बेंगलुरु तक सीमित नहीं। मैंने पाया है कि दिल्ली, गुरुग्राम, हैदराबाद और चेन्नई जैसे शहर भी हर मानसून में जलभराव और यातायात ठप होने की एक जैसी कहानी दोहराते हैं। हर शहर की स्थानीय वजहें थोड़ी अलग हैं — गुरुग्राम में तेज़ी से बना कंक्रीट का जंगल और अधूरी ड्रेनेज योजना, हैदराबाद में झीलों पर बढ़ता अतिक्रमण, और चेन्नई में तटीय इलाकों का असमान विकास — लेकिन नतीजा हर जगह एक जैसा है: हर मानसून में ठप पड़ता जनजीवन।
जलवायु परिवर्तन बनाम प्रशासनिक विफलता
जलवायु परिवर्तन की भूमिका
IPCC की रिपोर्टों में बार-बार यह बताया गया है कि गर्म होते समुद्र और बदलते वायुमंडलीय पैटर्न के कारण अल्प समय में अत्यधिक तीव्र बारिश की घटनाएं बढ़ रही हैं। यह वैज्ञानिक तथ्य है और इसे नकारा नहीं जा सकता।
शहरी नियोजन की नाकामी
लेकिन मेरा अनुभव यह भी कहता है कि सिर्फ जलवायु परिवर्तन को दोष देना अधूरा सच है। झीलों और वेटलैंड्स का सिकुड़ना, कंक्रीटीकरण, और तूफानी जल निकासी व्यवस्था का अपर्याप्त रखरखाव — ये सभी मानव-निर्मित कारण हैं जो बारिश के असर को कई गुना बढ़ा देते हैं। एक अध्ययन के अनुसार आने वाले दशकों में जलवायु परिवर्तन के चलते कुछ शहरों में पानी के बिल तक दोगुने हो सकते हैं, जो दिखाता है कि यह समस्या सिर्फ बाढ़ तक सीमित नहीं रहने वाली।
आर्थिक और सामाजिक असर
शहर डूबने का असर सिर्फ ट्रैफिक जाम तक सीमित नहीं रहता। दुकानदारों और छोटे व्यापारियों को रोज़ का कारोबार बंद करना पड़ता है, दफ्तर जाने वालों के घंटों बर्बाद होते हैं, और निचले इलाकों में रहने वाले परिवारों को हर साल घर के सामान और वाहन के नुकसान का सामना करना पड़ता है। सबसे ज्यादा असर उन परिवारों पर पड़ता है जो झुग्गी-बस्तियों या निचले इलाकों में रहते हैं, क्योंकि उनके पास बार-बार होने वाले नुकसान से उबरने के लिए सीमित संसाधन होते हैं।
असल में बदलाव कहाँ चाहिए
- झीलों, तालाबों और वेटलैंड्स के पुनर्जीवन पर तुरंत ध्यान देना होगा
- तूफानी जल निकासी नालों की नियमित सफाई और अतिक्रमण हटाना जरूरी है
- नए निर्माण में जल-पारगम्य (permeable) सतहों को अनिवार्य करना चाहिए
- शहरी बाढ़ पूर्वानुमान प्रणाली को स्थानीय स्तर पर और मजबूत करने की जरूरत है
- नागरिकों की भागीदारी बढ़ाकर स्थानीय स्तर पर जल-निकासी की निगरानी को मजबूत करना होगा
- शहरी नियोजन में “स्पंज सिटी” जैसी अवधारणाओं को अपनाकर हरित क्षेत्र और प्राकृतिक जल-अवशोषण क्षेत्र बढ़ाने होंगे
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
क्या सिर्फ जलवायु परिवर्तन मुंबई-बेंगलुरु की बाढ़ के लिए जिम्मेदार है?
नहीं, जलवायु परिवर्तन बारिश की तीव्रता बढ़ा रहा है, लेकिन झीलों पर अतिक्रमण और पुरानी ड्रेनेज व्यवस्था जैसी प्रशासनिक खामियां भी इसे उतना ही गंभीर बनाती हैं।
क्या बेंगलुरु में झीलों का सिकुड़ना बाढ़ की बड़ी वजह है?
हां, अध्ययन बताते हैं कि निर्मित क्षेत्र बढ़ने और जल-निकायों के घटने से शहर की प्राकृतिक जल-निकासी क्षमता काफी कम हुई है।
निष्कर्ष
मेरी समझ से मुंबई और बेंगलुरु की बाढ़ न तो केवल प्रकृति का प्रकोप है, न सिर्फ प्रशासन की गलती — यह दोनों के मेल का नतीजा है। जब तक शहरी नियोजन जलवायु परिवर्तन की नई हकीकत के अनुसार नहीं बदलता, तब तक हर मानसून यही कहानी दोहराई जाती रहेगी।
प्रमुख स्रोत एवं संदर्भ (References)
- भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc), बेंगलुरु — भूमि उपयोग और जल-निकाय अध्ययन
- IPCC रिपोर्ट — जलवायु परिवर्तन और चरम वर्षा पैटर्न
- भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) — मानसून बुलेटिन
